सिरदर्द बन चुका ​दून अस्पताल: UPNAL गार्ड्स पर ​​प्रशासन का कोई नियंत्रण नही?

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​ब्यूरो रिपोर्ट, देहरादून। उत्तराखंड: 06 May 2026, बुधवार को देहरादून / राजधानी स्थित सूबे  के सबसे बड़े राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल देहरादून में इन दिनों इलाज से ज्यादा विवादों की चर्चा है। सूत्रो के मुताबिक दून अस्पताल की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे उपनल (UPNL) के माध्यम से भर्ती पूर्व सैनिकों (एक्स-आर्मी गार्ड्स) का व्यवहार अब आम जनता के साथ-साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारों के लिए भी सिरदर्द बन चुका है।

​मरीजों के जख्मों पर ‘बदतमीजी’ का नमक- सूत्रो के मुताबिक –​दून अस्पताल में दूर-दराज से आए गरीब मरीज और उनके तीमारदार पहले ही बीमारी और व्यवस्थाओं से त्रस्त रहते हैं, ऊपर से इन गार्ड्स का अभद्र व्यवहार उनकी परेशानी को दोगुना कर देता है। हालिया घटना में इन सुरक्षाकर्मियों ने कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ न केवल धक्का-मुक्की की, बल्कि उनके साथ बेहद अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया।  वर्दी  गार्ड्स  के नशे में चूर इन गार्ड्स को न तो पत्रकारिता की गरिमा का भान है और न ही जनता की सेवा का।

​प्रशासन की ‘शह’ या लाचारी?-हैरानी की बात यह है कि दून मेडिकल कॉलेज का प्रशासन इन गार्ड्स पर आंख मूंदकर भरोसा करता है। प्राचार्य और आला अधिकारियों का तर्क है कि अस्पताल की व्यवस्था इन्हीं की बदौलत सुचारू है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। चर्चा है कि प्रशासन की ‘शह’ मिलने के कारण ही इन गार्ड्स पर न तो एमएस (MS) और न ही डिप्टी एमएस का कोई नियंत्रण रह गया है। आखिर क्या वजह है कि रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं?

 सूत्रो के मुताबिक ​’डबल कमाई’ और ‘बेरोजगारों’ के हक पर डाका-​अस्पताल परिसर में चर्चा का विषय यह भी है कि ये पूर्व सैनिक सेना से सम्मानजनक पेंशन प्राप्त कर रहे हैं और अब उपनल के जरिए दूसरी तनख्वाह भी उठा रहे हैं। ​”एक तरफ प्रदेश का शिक्षित बेरोजगार युवा उपनल की कतार में खड़ा है, वहीं दूसरी ओर अच्छी-खासी पेंशन पाने वाले लोग सिस्टम पर कब्जा जमाए बैठे हैं। नियमतः यह रोजगार शहीदों के आश्रितों या जरूरतमंद बेरोजगारों को मिलना चाहिए ताकि उन्हें जीविका का साधन मिल सके।”

जनता की मांग: प्राइवेट एजेंसी को मिले कमान-हमारे संवाददाता ने जब अस्पताल में आए तीमारदारों से बात की, तो जनता का आक्रोश फूट पड़ा। वही , लोगों का कहना है कि ​इन गार्ड्स में नौकरी जाने का कोई डर नहीं है, इसलिए ये बेलगाम हैं।
​इनकी जगह किसी निजी सुरक्षा एजेंसी को मौका दिया जाना चाहिए।
​प्राइवेट गार्ड कम वेतन में भी जिम्मेदारी और शालीनता से काम करते हैं क्योंकि उन्हें जवाबदेही का डर होता है।

निष्कर्ष-​पत्रकार का काम अस्पताल की कमियों को उजागर कर प्रशासन को आईना दिखाना है ताकि जनहित में सुधार हो सके। लेकिन दून अस्पताल में सच दिखाने वालों की आवाज दबाने की कोशिश हो रही है। यदि वक्त रहते इन ‘वर्दीधारी’ गार्ड्स के रवैये पर लगाम नहीं कसी गई, तो दून अस्पताल की छवि पूरी तरह धूमिल हो जाएगी।

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