न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 07 May 2026, गुरुवार को प्राप्त जानकारी के मुताबिक क्या आपको लगता है कि बंगाल के राज्यपाल इस स्थिति में कड़ा रुख अपनाएंगे या वे अदालती दखल का इंतजार करेंगे? भारतीय राजनीति में ऐसे कई मौके आए हैं जब मुख्यमंत्रियों ने अपनी मर्जी से इस्तीफा देने में आनाकानी की, लेकिन अंततः उन्हें ‘संवैधानिक चाबुक’ के जरिए पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
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यदि ममता बनर्जी आज (2026 में) यह कह रही हैं कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह केवल एक राजनैतिक विलंब (Stalling Tactic) हो सकता है, क्योंकि राज्यपाल के बर्खास्तगी के आदेश पर हस्ताक्षर होते ही उनकी संवैधानिक शक्तियां शून्य हो जाएंगी। जानकारी के मुताबिक भारतीय संविधान में कोई भी मुख्यमंत्री अपनी इच्छा से तब तक पद पर नहीं रह सकता जब तक उसके पास सदन का विश्वास और कानून की मान्यता न हो। ममता बनर्जी के वर्तमान हठ (जैसा कि मई 2026 की खबरों में वर्णित है) से पहले के कुछ प्रमुख उदाहरण और उन पर हुई कार्यवाहियां नीचे दी गई हैं:
(1) कल्याण सिंह (उत्तर प्रदेश, 1998) – “बर्खास्तगी और फिर वापसी”–यह भारतीय राजनीति का सबसे नाटकीय उदाहरण है। 1998 में राज्यपाल रोमेश भंडारी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बिना बहुमत साबित करने का मौका दिए रातों-रात बर्खास्त कर दिया था और जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी थी। क्या हुआ: कल्याण सिंह ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया और अदालत पहुंच गए।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक कार्यवाही: मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। अदालत ने एक ऐतिहासिक कंपोजिट फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया। सदन में वोटिंग हुई, जिसमें कल्याण सिंह को बहुमत मिला और जगदंबिका पाल (जो केवल 48 घंटे के मुख्यमंत्री रहे) को हटना पड़ा।
(2) ओम प्रकाश चौटाला (हरियाणा, 1990) – “नैतिक और राजनैतिक दबाव”
1990 में ओम प्रकाश चौटाला केवल 5 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे। उन पर चुनावी धांधली और हिंसा (मेहम कांड) के गंभीर आरोप लगे थे। क्या हुआ: चौटाला इस्तीफा देने को तैयार नहीं थे।
कार्यवाही: तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने उन पर जबरदस्त दबाव बनाया। जब वे नहीं माने, तो केंद्र सरकार ने उन्हें पद से हटाने की चेतावनी दी और अंततः उन्हें अपनी ही पार्टी (जनता दल) के निर्देश पर हटना पड़ा। यदि वे नहीं हटते, तो राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता।
(3) एन.टी. रामा राव (आंध्र प्रदेश, 1984) – “जनता और अदालत का मोर्चा”
आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री एनटीआर को उनकी अनुपस्थिति में (जब वे इलाज के लिए विदेश गए थे) राज्यपाल रामलाल ने बर्खास्त कर दिया था और भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया।
क्या हुआ: एनटीआर ने इस अन्याय को स्वीकार नहीं किया और अपने विधायकों के साथ दिल्ली में राष्ट्रपति के सामने परेड की।
कार्यवाही: भारी जन-आक्रोश और राजनैतिक दबाव के कारण राज्यपाल को इस्तीफा देना पड़ा और भास्कर राव को हटाकर एनटीआर की पुनः बहाली हुई।
(4) जीतन राम मांझी ( बिहार )
अगर ममता बनर्जी या कोई भी मुख्यमंत्री हार के बाद भी इस्तीफा न दे, तो संविधान के पास ये ‘इलाज’ हैं:
राज्यपाल का ‘सस्पेंशन’ (Dismissal): जानकारी के मुताबिक अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है। यदि राज्यपाल संतुष्ट हैं कि मुख्यमंत्री के पास बहुमत नहीं है या वह सदन का सदस्य नहीं रह गया है, तो वे एक पत्र जारी कर उसे बर्खास्त कर देते हैं। इसके बाद वह व्यक्ति ‘पूर्व मुख्यमंत्री’ हो जाता है।
प्रशासनिक असहयोग: बर्खास्तगी के तुरंत बाद मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को आदेश दिया जाता है कि वे उस व्यक्ति का कोई भी आदेश न मानें। उनके सरकारी वाहन, सुरक्षा और आवास की सुविधाएं वापस ले ली जाती हैं।
धारा 356 (राष्ट्रपति शासन): यदि स्थिति बहुत ज्यादा बिगड़ जाए और मुख्यमंत्री दफ्तर छोड़ने को तैयार न हो, तो केंद्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा देती है। इसके बाद पूरी सत्ता राज्यपाल के हाथ में चली जाती है।
अदालती आदेश (Writ of Quo Warranto): कोई भी नागरिक अदालत जा सकता है और पूछ सकता है कि “आप किस अधिकार से इस कुर्सी पर बैठे हैं?” (Quo Warranto)। अदालत उन्हें तुरंत पद से बेदखल करने का आदेश दे सकती है।
इतिहास गवाह है कि कुर्सी पर कोई कितना भी चिपक जाए, संवैधानिक मर्यादा और संख्या बल के आगे उसे झुकना ही पड़ता है। यदि ममता बनर्जी आज (2026 में) यह कह रही हैं कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह केवल एक राजनैतिक विलंब (Stalling Tactic) हो सकता है, क्योंकि राज्यपाल के बर्खास्तगी के आदेश पर हस्ताक्षर होते ही उनकी संवैधानिक शक्तियां शून्य हो जाएंगी।