कोचिंग-बनाम-शिक्षा पर जारी बहस में कुछ मित्रों ने सवाल उठाया

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उत्तराखंड: 03 JUNE 2026, बुधवार को देहरादून । देशभर   से मिली जानाकरी के अनुसार कोचिंग-बनाम-शिक्षा पर जारी बहस आज के समय में एक ज्वलंत विषय है, जो मुख्य रूप से स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NEET, JEE, UPSC) की बढ़ती मांग के बीच के अंतर से उपजा है। जहाँ एक ओर पारंपरिक शिक्षा छात्रों के सर्वांगीण विकास पर जोर देती है,  कोचिंग-बनाम-शिक्षा पर जारी बहस में कुछ मित्रों ने सवाल उठाया,सरकारी शिक्षा व्यवस्था का पतन आरक्षण के कारण हुआ,अयोग्य शिक्षकों ने शिक्षण संस्थानों को दीमक की तरह चाट लिया।
सामाजिक प्रतिष्ठा पर जीते “सरकारी शिक्षण संस्थान” और “सरकारी अस्पताल”,इन दो की सामाजिक_पूंजी खत्म करना संगठित_कारोबारियों का लक्ष्य रहा,समाज का नहीं। याद रखे,-निजी_स्वास्थ्य-सेवा के पीछे खरबों डॉलर की फार्मा-इंडस्ट्री खड़ी है।बाजार की इस बिसात पर नव_पूंजीवाद का हथियार बना आरक्षण।
मेरा कोई विरोध नहीं,इस दृष्टि पर।सहमत हूं।क्योंकि 100 प्रतिशत अंक लाने वाला युवा ही शिक्षक बनने के बाद 80 या 90 प्रतिशत योग्यता का छात्र दे सकेगा।लेकिन यदि शिक्षक स्वयं -10 प्रतिशत योग्यता का है तो कैसे संभव है, दस या बीस प्रतिशत योग्यता के छात्र का निर्माण कर सके?
लेकिन मेरा निवेदन व्यापक है,आरंभिक दौर में जिन्होंने “आरक्षण की रणनीति” पर विचार किया,उनका सामाजिक_न्याय का उद्देश्य हाशिए पर था।आरक्षण के पीछे खड़ी ताकतों की नजर भारत के व्यापक_बाजार पर थी।जो अरबो डॉलर का है।जिसका विध्वंस नीतिगत_हस्तक्षेप किए बिना संभव ही नहीं था।
समय के साथ सरकारी पटना,प्रेसिडेंसी,इलाहाबाद,लखनऊ,काशी..और भी ना जाने तमाम विश्विद्यालय रसातल में चले गए।ये दोनों संस्थान आज हाशिए पर खड़े समाज के #सहारा है।समाज का सक्षम शायद ही इनकी ओर झांकता हो।
फिर भी सचेत कर रहा हूं,फिलिपकार्ट,अमेजन जैसी कंपनियां जैसे जैसे अंदरूनी गांवों तक सर्विस दे रही है?बता रहा है,असंगठित बाजार में कैसे #संगठित होकर घुसा जाए? ध्यान रहे,यह बाजार भी हजारों करोड़ का है।अपार अवसर है।साथ ही #ग्रामीण_अर्थव्यवस्था को तबाह कर करोड़ों #जीविका खत्म करने का लक्ष्य भी है।
आरक्षण,विनाश और संगठित बाजार,इन तीनों को समग्रता में देखने,समझने की जरूरत है। इन पर व्यापक_लोकविमर्श की अत्यंत जरूरत है।वरना आपका #स्वदेशी का हर नारा चौराहों पर मार दिया जाएगा।
उदाहरण के लिए अब चंबल में भी शहर से 40 किलोमीटर दूर गुर्जर_गौपालकों के घरों की महिलाएं तक ऑनलाइन_ऑर्डर कर रही हैं। पहले इनमें100 में से 50 समान गांव में ही चल रही समाज की ही दुकानों से मिल जाता था।

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