न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 31 JULY 2026, संपादकीय …किसी भी लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन जब किसी आंदोलन के दौरान हिंसा, पत्थरबाजी, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो आंदोलन की मूल भावना पर भी सवाल खड़े हो जाते हैं। ऐसे मामलों में कानून का निष्पक्ष पालन होना चाहिए और हिंसा में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
यदि पुलिस के पास वीडियो और अन्य साक्ष्य हैं, तो उनके आधार पर दोषियों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई करना स्वाभाविक प्रक्रिया है। वहीं दूसरी ओर, राजनीतिक दलों और आंदोलन से जुड़े संगठनों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे स्पष्ट करें कि हिंसा में शामिल लोगों से उनका क्या संबंध है और यदि वे वास्तव में बाहरी तत्व थे, तो इसकी निष्पक्ष जांच का समर्थन करें।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि किसी भी हिंसक घटना के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। एक पक्ष दूसरे पर साजिश का आरोप लगाता है, जबकि दूसरा पक्ष कार्रवाई पर सवाल उठाता है। ऐसे माहौल में सच्चाई केवल निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आ सकती है, न कि राजनीतिक बयानबाजी से।
देश की राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद और कानून का सम्मान है। किसी भी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए हिंसा का सहारा लेना या हिंसा को किसी भी रूप में उचित ठहराना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन हिंसा की स्पष्ट शब्दों में निंदा करें, जांच में सहयोग दें और युवाओं को उकसाने के बजाय शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखने के लिए प्रेरित करें। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि कार्रवाई पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के दायरे में हो, ताकि किसी निर्दोष को परेशानी न हो और दोषी किसी भी कीमत पर बच न सकें।
आखिरकार, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन देश और लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थायी हैं। इसलिए राजनीतिक संघर्ष लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर ही होना चाहिए। हिंसा किसी भी पक्ष के हित में नहीं होती—उसका सबसे बड़ा नुकसान देश, समाज और आम नागरिक को ही उठाना पड़ता है।
वही जिसमें मोदी आज प्रधानमंत्री हैं, कल कोई दूसरा हो सकता है लेकिन देश तो हमेशा रहेगा। अगर देश जलेगा तो कोई नहीं बचेगा। भाजपा से राजनीतिक लड़ाई लड़ने में विपक्ष अक्षम महसूस कर रहा है। इसलिए वो देश को दंगे की आग में जलाना चाहता है। ये आंदोलन भी विपक्ष की एक साजिश है। जिसे देश के युवाओं को भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अजीब बात यह है कि देश को आग लगाने वालों का समर्थन किया जा रहा है क्योंकि ये लोग मोदी को गाली दे रहे हैं।