दून के प्रमुख अस्पतालों में बजट एवं मैनपावर की कमी ने बांधी डॉक्टरों के हाथ: बुनियादी सुविधाएं भी अधर में

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उत्तराखंड: 06 AUG. 2026, गुरुवार को देहरादून / राजधानी स्थित  कोरोनेशन जिला अस्पताल और गांधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय देहरादून  में मरीजों को बेहतर और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे तो बड़े-बड़े किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। हाल ही में दोनों अस्पतालों की व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें मरीजों को उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं देने पर मंथन किया गया था।बता दे कि जिला अस्पताल कोरोनेशन में रोज करीब 800-900मरीज इालज के लिए आते है, वही दुसरी ओर उप चिकित्साल गांधी शताब्दी नेत्र अस्पताल देहरादून में रोज आना करीब 250 मरीजो को पंजिकारण होता है। लेकिन यह पर 4 डाक्टरो की ही ओपीडी चलती है।

​संयुक्त बैठक में हुआ था बेहतर सेवाओं का मंथन-कोरोनेशन अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक (पीएमएस) डॉ. यतेंद्र सिंह और गांधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय के नवनियुक्त नोडल अधिकारी डॉ. दिनेश चौहान की संयुक्त अध्यक्षता में हुई इस बैठक का मुख्य उद्देश्य मरीजों को सुगम और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराना था। अधिकारियों ने उम्मीद जताई थी कि इन प्रयासों से दून के दोनों प्रमुख अस्पतालों में आने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी।

​इस दौरान  जब हमारे ब्यूरो वरिष्ठ पत्रकार सोमपाल सिंह ने गांधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय के नोडल अधिकारी डॉ. दिनेश चौहान से इस संबंध में जमीनी हकीकत जानी, तो उन्होंने कई गंभीर समस्याओं और व्यवस्थाओं की पोल खोल दी। ​डॉ. चौहान ने बताया कि अस्पताल प्रशासन की ओर से 32 सूत्रीय मांगें स्वास्थ्य महानिदेशालय, उत्तराखंड को भेजी जा चुकी हैं, जिनमें से कुछ मांगें कोरोनेशन जिला अस्पताल प्रशासन के समक्ष भी रखी गई हैं। लेकिन सबसे बड़ी बाधा ‘बजट की कमी’ है, जिसके चलते अस्पताल प्रशासन के हाथ पूरी तरह बंधे हुए हैं।

​बुनियादी सुविधाओं के लिए भी करना पड़ रहा संघर्ष- नोडल अधिकारी डॉ. दिनेश चौहान ने बताया कि छोटे-छोटे खर्चों और व्यवस्थाओं के लिए भी उन्हें जिला अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे समय पर मरीजों को अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं:

​पेयजल संकट: उमस भरी गर्मी के इस मौसम में अस्पताल परिसर की पार्किंग में रखा वाटर कूलर खराब पड़ा है, जिसे ठीक कराने या बदलवाने के लिए भी पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं है। इससे मरीजों और तीमारदारों को पीने के पानी के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।

डॉक्टरों के लिए वॉशरूम: अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों की ओपीडी के पास वॉशरूम की व्यवस्था करना इस समय की सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जो बजट के अभाव में लंबित है।
​परिसर की साफ-सफाई: अस्पताल परिसर को स्वच्छ और सुंदर बनाने तथा छोटे-छोटे उपकरणों पर खर्च करने के लिए भी फंड की कमी आड़े आ रही है।

नोडल अधिकारी डॉ. दिनेश चौहान ने बताया-​खाली कमरों और वार्डों का जीर्णोद्धार: अस्पताल में कई कमरे और वार्ड खाली पड़े हैं, जो बदहाल स्थिति में हैं। यदि इनकी साफ-सफाई और टूट-फूट की मरम्मत करा दी जाए, तो इन्हें दोबारा मरीजों के उपयोग में लाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए भी बजट की सख्त आवश्यकता है।

महानिदेशालय को भेजा गया पत्र, अब बजट का इंतजार–इस  अस्पताल के लिए नए बड़े उपकरणों, डेंटल यूनिट के लिए जरूरी सामान, मैनपॉवर और अन्य उच्चस्तरीय व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य महानिदेशक को पहले ہی पत्र के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। ​अब देखना यह होगा कि शासन और स्वास्थ्य विभाग इन गंभीर समस्याओं पर कब संज्ञान लेता है और अस्पतालों को कब तक जरूरी बजट और सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।

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