न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 10 JULY 2026, शुक्रवार को देहरादून/नई दिल्ली। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़ा विधेयक संसद के 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में पेश होने की संभावना नहीं है। इसकी वजह संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की रिपोर्ट का अभी तैयार न होना है।
देशभर में लंबे समय से चर्चा का विषय बने ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation One Election) को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है, लेकिन इस दौरान सरकार की ओर से इस महत्वाकांक्षी योजना से जुड़ा विधेयक पेश किए जाने की संभावना लगभग खत्म होती नजर आ रही है।
जानकारी के मुताबिक जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने बताया कि समिति ने अब तक केवल 10 राज्यों का दौरा किया है और कई राज्यों, राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों व संबंधित पक्षों से चर्चा अभी बाकी है। इसलिए समिति अपने कार्यकाल को 14 अगस्त के बाद बढ़ाने का अनुरोध करेगी।
सरकार को क्या होगा फायदा?--सरकारी आकलन के मुताबिक यदि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते हैं तो करीब 7 लाख करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। इसके अलावा बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्यों में आने वाली बाधाएं भी कम होंगी और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को लागू करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत, राज्यों की मंजूरी, चुनाव आयोग की तैयारी और बड़ी संख्या में ईवीएम की व्यवस्था जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। ऐसे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2034 के आम चुनाव से पहले ‘एक देश, एक चुनाव’ व्यवस्था लागू होना मुश्किल है। सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था से चुनावी खर्च और प्रशासनिक संसाधनों की बड़ी बचत हो सकती है।
समिति में कौन-कौन हैं शामिल?–‘एक देश, एक चुनाव’ पर गठित संयुक्त संसदीय समिति में कुल 39 सदस्य शामिल हैं। इनमें 27 सदस्य लोकसभा और 12 सदस्य राज्यसभा से हैं। समिति में प्रियंका गांधी, मनीष तिवारी, अनुराग ठाकुर, बांसुरी स्वराज, सुप्रिया सुले, धर्मेंद्र यादव और कल्याण बनर्जी जैसे कई प्रमुख सांसद शामिल हैं।अब सभी की नजर मानसून सत्र और जेपीसी की अगली बैठक पर टिकी हुई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि जेपीसी समय पर रिपोर्ट सौंप भी देती है, तब भी कानून बनाने, संसद से पारित कराने, राज्यों की मंजूरी, चुनाव आयोग की तैयारी और ईवीएम की उपलब्धता जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। ऐसे में 2034 के आम चुनाव से पहले ‘एक देश, एक चुनाव’ व्यवस्था लागू होने की संभावना काफी कम मानी जा रही है।