उत्तराखंड: 24 MARCH 2026, मंगलवार को देहरादून / राजधानी स्थित देहरादून में कुकुरमुत्ता की तरह पनप रहे प्राइवेट निजी की अस्पताल यह लग्जरी होटल से काम नहीं है यह छोटी से छोटी बीमारी के लिए भी अगर कोई मरीज आता है तो उसकी पूरी तरह से जब खाली करके भेजते हैं। सूत्रो के मुताबिक राजधानी देहरादून में इन दिनों प्राइवेट अस्पतालों की संख्या कुकुरमुत्तों की तरह तेजी से बढ़ती जा रही है। लेकिन इन अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आम जनता का आरोप है कि ये निजी अस्पताल इलाज के नाम पर खुली लूट मचा रहे हैं, जहां छोटी से छोटी बीमारी में भी मरीजों से भारी-भरकम बिल वसूले जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सामान्य बुखार, हल्की चोट या साधारण जांच के नाम पर मरीजों को अनावश्यक टेस्ट, महंगे पैकेज और लंबा बिल थमा दिया जाता है। कई मामलों में मरीजों को जरूरत से ज्यादा समय तक भर्ती रखा जाता है, जिससे बिल और बढ़ता जाता है। ऐसे में गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार आर्थिक रूप से टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं।
जिसमें इस पूरे मामले की शिकायत जब मुख्य चिकित्साधिकारी देहरादून (CMO) तक पहुंची, तो कार्रवाई के बजाय जिम्मेदारी से बचने की स्थिति सामने आई। सूत्रों के अनुसार, संबंधित विभाग ने संसाधनों और अधिकारों की कमी का हवाला देकर प्रभावी कार्रवाई करने में असमर्थता जताई है, जो कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। कानूनी नजरिए से मामला गंभीर… स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई अस्पताल मरीजों से अनुचित शुल्क वसूलता है या अनावश्यक जांच/भर्ती करता है, तो यह Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 और उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का उल्लंघन हो सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित अस्पतालों के खिलाफ जांच, लाइसेंस निरस्तीकरण और दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
साथ ही प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल-दून शहर में लगातार बढ़ रही शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई का अभाव यह संकेत देता है कि या तो निगरानी तंत्र कमजोर है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं। यदि जल्द ही सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति आम जनता के स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा दोनों के लिए खतरा बन सकती है।
जनता की मांग- प्राइवेट अस्पतालों की दरों का निर्धारण और सार्वजनिक प्रदर्शन
अनावश्यक जांच व भर्ती पर सख्त निगरानी
दोषी अस्पतालों के लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई
हेल्पलाइन और शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत किया जाए
निष्कर्ष: देहरादून में स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण अगर इसी तरह बेलगाम रहा, तो “इलाज” एक सुविधा नहीं बल्कि आम आदमी के लिए “सजा” बन जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है और इस ‘मेडिकल माफिया’ पर लगाम लगाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते