परेड ग्राउंड में गंदगी, निगम आयुक्त और महापौर के वादे बेअसर, दावों की खुली पोल:

परेड ग्राउंड में गंदगी पर ‘चुप’ प्रशासन, जनस्वास्थ्य से खिलवाड़!

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उत्तराखंड: 19 MARCH 2026, ब्रहस्पतिवार को देहरादून / राजधानी स्थित प्राप्त जानकारी के मुताबिक   परेड ग्राउंड देहरादून को स्मार्ट सिटी के तहत अत्याधुनिक और स्वच्छ बनाने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है। मैदान में फैली गंदगी ने न सिर्फ व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि सीधे तौर पर नगर निगम देहरादून की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

देहरादून नगर निगम आयुक्त और देहरादून महापौर द्वारा समय-समय पर शहर को स्वच्छ और व्यवस्थित बनाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन परेड ग्राउंड की स्थिति इन दावों को खोखला साबित कर रही है। सुबह-सुबह सैर करने आने वाले नागरिकों को जहां स्वच्छ वातावरण मिलना चाहिए, वहां कूड़े के ढेर, प्लास्टिक कचरा और गंदगी से सामना हो रहा है।

दावों के उलट जमीनी सच्चाई: जहां एक ओर स्मार्ट सिटी के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर महंगे पेड़-पौधे और सजावटी व्यवस्थाएं की गईं, वहीं दूसरी ओर उनकी देखरेख पूरी तरह नदारद है। न तो नियमित सफाई हो रही है और न ही माली की कोई व्यवस्था नजर आ रही है। इससे साफ है कि योजना सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है।
विभागीय लापरवाही चरम पर: परेड ग्राउंड में कई दिनों से गंदगी का अंबार लगा है, जो यह दर्शाता है कि संबंधित विभाग न केवल अपने कर्तव्यों की अनदेखी कर रहा है, बल्कि उच्च अधिकारियों के निर्देश भी धरातल पर लागू नहीं हो रहे। यह स्थिति सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है।

कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता प्रशासन: सार्वजनिक स्थलों की साफ-सफाई सुनिश्चित करना नगर निगम की कानूनी जिम्मेदारी है, लेकिन यहां स्थिति इसके उलट है। यदि इस लापरवाही से किसी प्रकार की बीमारी फैलती है, तो संबंधित अधिकारी जवाबदेह होंगे और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी संभव है।
जनता में रोष, कार्रवाई की चेतावनी:
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर जल्द ही सफाई व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला उच्च स्तर तक उठाया जाएगा।

निष्कर्ष: स्मार्ट सिटी के नाम पर किए गए वादे और धरातल की सच्चाई के बीच की खाई अब साफ दिखने लगी है। परेड ग्राउंड की बदहाल स्थिति ने यह साबित कर दिया है कि दावों और हकीकत में कितना बड़ा अंतर है—और यह अंतर अब जनता के गुस्से में बदलता जा रहा है।

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