उत्तराखंड: 18 जुलाई 2025 , शिक्षक डॉ रवि शरण दीक्षित के अनुसार वर्तमान परिवेश मे समाज के एक वर्ग की अभिव्यक्ति मे स्वतंत्रता ऐसे कार्यों पर दिखने लगी है, जिसका माध्यम सोशल मीडिया, इसका मूल आधार बनता जा रहा है जो समाज एक बड़े वर्ग तथा, परिवार, नागरिकों के बीच दूरी को बढ़ाते हैं तथा वैचारिक दुनिया को भ्रमित करने में भी सहायक हो रहा है। इसके प्रयोग पर एक बार पुनर्विचार सहित समुचित प्रयोग करने की आवश्यकता है । यद्यपि हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देखा है लेकिन यह स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को किस हद तक प्रयोग करनी है इस पर भी समझने और सोचने की आवश्यकता है। सामाजिक समरसता, संप्रभुता, एकता और अखंडता पर यह प्रश्न खड़े कर देती है । हाल में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर एक सख्त टिप्पणी की है।
भारतीय संस्कृति,नैतिकता अच्छे बुरे के बीच फर्क और सही काम को करने को संदर्भित करता है, जहां जीवन में सामाजिक आदर्श सम्मान, नैतिक मूल्य,सामाजिक आदर्श,पारिवारिक संबंध की महत्व को भी प्रदर्शित करता है । वर्तमान समय में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इस इन सब चीजों को मूल्य पर आधारित संस्कृति का दुरुपयोग कर रहे हैं और एक प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। साथ ही अनावश्यक इस तरह की रील या इस तरह की वीडियो अपलोड हो रहे हैं जो समाज को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं जो एक काल्पनिक सोच को दर्शाते हैं इस पर सख्त नियंत्रण की आवश्यकता है।
साथ ही साथ यह एक सामान्य मनुष्य के जीवन के तीन से चार घंटे सिर्फ सोशल मीडिया के तथाकथित प्रयोग मे ले रहे हैं। निश्चित ही इसका अगर आउटकम पूछा जाए तो बता पाना बहुत कठिन होगा, जब हम युवा पीढ़ी की बात करते हैं तो हमें इस बात को भी समझना होगा कि युवावस्था, उनके भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। और उसे समय में तीन से चार घंटे समय इस सोशल मीडिया पर बर्बाद करना,जो सामाजिक समरसता को भी आहत करता है,पारिवारिक रिश्तों को भी आहत करता है मूल्यों को तो आहात करता ही है साथ ही अध्ययन को निश्चित ही को प्रभावित करता है।
इतिहास इस बात का गवाह हैकी सांस्कृतिक जड़ों पर अगर चोट की जाती है तो वह चोट बहुत लंबे समय तक रहती है। और जिसकी परिणीति गुलामी के रूप में हमारे सामने आती है, और इस समय सोशल मीडिया की गुलामी से समाज ग्रसित हो रहा है, और इसके दुष्परिणामों के आकलन भी समाज के सामने आने लगे हैं।
आज के समय में भारतीय संस्कृति पर चोट मानसिक गुलामी की ओर ले जा रही है जहां पर एक बार विशेष कर युवा पीढ़ी, भ्रमित हो रहा है जो उनकी मानसिक स्वास्थ्य व्यावहारिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। और भारतीय सामाजिक परंपरा मूल्य पर समाज के विकास के लिए यह अति आवश्यक है । शक्ति का प्रयोग समाज के नवनिर्माण में करें ना कि समाज को भ्रमित करने में सोशल का सही प्रयोग चुनौतियों को सामना करने में सहायक होगा और यह शक्ति नई पीढ़ी के पास है जो पुरानी पीढ़ी के पास नहीं थी। सजग प्रयोग सफल जिंदगी देगा।
डॉ रवि शरण दीक्षित