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सत्ता के खेल में अब सवर्णों को बलि चढ़ाया जा रहा है!

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न्यूज डेस्क / उत्तराखंड: 29 Jan.2026,  गुरुवार को देहरादून ।  संपादकीय… सत्ता के खेल में अब सवर्णों को बलि चढ़ाया जा रहा है -सत्ता का नशा और UGC : यह आज की बात नहीं है, सदियों से चला आ रहा है। इसी सत्ता के नशे ने महाभारत करवाया और इसी ने विश्वयुद्धों की नींव रखी, अगर पूरी दुनिया में सबसे बड़ा कोई नशा है, तो वह है सत्ता का नशा—शासन करने का नशा!

जो जहाँ शासन कर रहा है, वह वहाँ मरते दम तक बने रहना चाहता है। चाहे वह किसी देश का शासन हो, किसी राज्य का, किसी छोटे से कबीले का, या फिर खेल का मैदान ही क्यों न हो; जो मुखिया है, वह मुखिया बने रहना चाहता है,

अनंतकाल पहले माता कैकेयी ने भरत के लिए राजपाट माँगकर प्रभु राम को वनवास भिजवा दिया। दुर्योधन ने सत्ता के लालच में कुल का विनाश स्वीकार किया पर सुई की नोक बराबर जमीन देना स्वीकार नहीं किया ,

अलेक्जेंडर को दुनिया जीतने का नशा था; उसे लगता था पूरी दुनिया पर बस वही राज करेगा। सत्ता का गणित सीधा है—जिसके पास नहीं है, वह हर हाल में पाना चाहता है, और जिसके पास है, वह किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता,

नशे को अब राजनीति से जोड़ता हूँ। चाहे नेहरू जी हों, इंदिरा जी या फिर मोदी जी—जिसको यह नशा हो गया, वह इसे छोड़ना नहीं चाहता, यह नशा तब और गहरा हो जाता है जब कोई पद पर दो या उससे अधिक कार्यकाल पूरे कर ले। फिर वह खुद को हटाने नहीं देता, चाहे उसके लिए ‘साम-दाम-दंड-भेद’ कुछ भी अपनाना पड़े। वह चाहता है कि सत्ता बस उसी की बनी रहे, मैं मानता हूँ कि मोदी जी ने बहुत से बेहतरीन काम किए हैं, पर अब उन पर भी सत्ता का नशा चढ़ने लगा है। उन्हें लगने लगा है कि किसी भी नीति से अपनी जगह टिके रहना ही सर्वोपरि है,

जो काम रूस के पुतिन, उत्तर कोरिया के किम जोंग, चीन के शी जिनपिंग और इज़राइल के नेतन्याहू कर चुके हैं, अब शायद मोदी जी भी उसी राह पर हैं , इसी नशे से बचने के लिए कई देशों में कानून है कि कोई अधिकतम दो बार ही पद पर रह सकता है। जो तीसरी बार गया, वह कुर्सी खाली नहीं करना चाहेगा,

UGC के जरिए 2029 की तैयारी इसी ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति का हिस्सा लगती है। सत्ता के नशे में अक्सर ऐसा होता है—प्रभाव की चिंता किए बिना बस वही किया जाता है जिससे कुर्सी बची रहे ,  एक स्वर्ण नागरिक  नजरिए से UGC के ये नए नियम गलत हैं। हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में पहले से ही हर नागरिक को समानता का अधिकार प्राप्त है। फिर श्रेणियों में बाँटकर नए नियम बनाना समानता नहीं, बल्कि विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा है, यह तय है कि इन नियमों का भी दुरुपयोग होगा।

सत्ता के खेल में अब सवर्णों को बलि चढ़ाया जा रहा है ,  वही जिसमें SC/ST और OBC के तमाम मित्र हैं। न उन्हें कभी कोई परेशानी हुई, न हमने कभी जिक्र किया। हम साथ रहते हैं, खाते-पीते हैं; आज तक किसी सवर्ण द्वारा उनके शोषण की बात सामने नहीं आई। हमारे रिश्ते बेहतरीन रहे हैं, लेकिन इस UGC नियम ने जानबूझकर समाज में तकरार पैदा करने की कोशिश की है। एक-दूसरे को जात-पात के नाम पर लड़वा देना ही तो सत्ता का नशा है,

अगर UGC इतना ही जरूरी है, तो एक क्लॉज़ जोड़ दीजिए कि यह ‘सबके लिए’ लागू होगा। जिसका भी शोषण हो, उसे सुरक्षा मिले। साथ ही, यह भी जोड़ें कि यदि जाँच में आरोप फर्जी पाया जाए, तो शिकायत करने वाले को भी उतनी ही कठोर सजा मिले जितनी आरोपी के लिए तय थी। असली न्याय तभी होगा जब लोग फर्जी केस ठोकना बंद करेंगे,

वही जिसमें सत्ता का नशा जनता के हितों से ऊपर नहीं होना चाहिए। समय रहते मोदी जी को सत्ता का मोह छोड़ देना चाहिए। उन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया है,सत्ता एक मशाल है, इसे समय रहते अगली पीढ़ी को सौंप देना ही बड़प्पन है

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