उपभोक्ता सोमपाल की बड़ी जीत: आयोग ने MDDA को ठहराया दोषी, मुआवजे का आदेश

फ्लैट में खामियां पड़ी भारी: एमडीडीए को देना होगा मुआवजा

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उत्तराखंड: 09 April 2026, गुरुवार को देहरादून/राजधानी में देहरादून उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला: एमडीडीए को उपभोक्ता को मुआवजा देने के आदेश :यह  मामला सोमपाल सिंह निवासी करनपुर देहरादून द्वारा दायर उपभोक्ता शिकायत से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने एमडीडीए पर आवंटित फ्लैट में कमियों और लापरवाही का आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता का कहना था कि उन्होंने फ्लैट की पूरी धनराशि जमा करने के बावजूद निर्माण कार्य में खामियां थीं, जिन्हें ठीक नहीं किया गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, देहरादून ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वाद संख्या सीसी/33/18 के अनुसार उपभोक्ता के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए एमडीडीए (MDDA) को मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला 7 अप्रैल 2026 को पारित किया गया।

देहरादून: जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, देहरादून ने एक अहम और मिसाल कायम करने वाले फैसले में मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) को उपभोक्ता के प्रति सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने यह निर्णय दिनांक 07 अप्रैल 2026 को पारित किया।

यह वाद सोमपाल सिंह बनाम एमडीडीए (परिवाद संख्या DC/49/CC/33/2018) से संबंधित है, जिसमें शिकायतकर्ता सोमपाल सिंह, निवासी करनपुर देहरादून, देहरादून ने अपने आवंटित फ्लैट में गंभीर खामियों, अधूरे निर्माण कार्य और विभागीय लापरवाही का आरोप लगाया था।

मामले का पूरा विवरण:

परिवादी के अनुसार, एमडीडीए की आवासीय योजना के अंतर्गत लॉटरी के माध्यम से उन्हें एक LIG फ्लैट आवंटित हुआ था। उन्होंने समय-समय पर पूरी धनराशि ₹12,85,597 जमा कर दी, जिसके बाद 29 जून 2016 को फ्लैट का भौतिक कब्जा भी सौंप दिया गया।

लेकिन कब्जा मिलने के बाद जब फ्लैट का निरीक्षण किया गया, तो उसमें कई निर्माण संबंधी खामियां पाई गईं। आरोप है कि:

  • प्लास्टर, फिनिशिंग और अन्य निर्माण कार्य अधूरे थे
  • कई तकनीकी खामियां थीं
  • बार-बार शिकायत करने के बावजूद एमडीडीए ने सुधार नहीं किया

परिवादी ने 13 दिसंबर 2016 से लेकर 2017 तक कई बार लिखित शिकायतें दीं, लेकिन विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। अंततः मजबूर होकर परिवादी ने अपने स्तर से ही फ्लैट में सुधार कार्य कराया, जिसमें ₹70,440 खर्च हुए।

विपक्षी पक्ष का रवैया:

आयोग की कार्यवाही के दौरान एमडीडीए को कई अवसर दिए गए, लेकिन:

  • समय पर संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया
  • आवश्यक साक्ष्य भी दाखिल नहीं किए गए

आयोग ने सुप्रीम उपभोक्ता न्यायालय (राष्ट्रीय आयोग) के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि यदि विपक्षी पक्ष उचित अवसर मिलने के बाद भी जवाब नहीं देता, तो इसे आरोपों की स्वीकृति माना जा सकता है।

आयोग की कानूनी टिप्पणी:

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि:

  • परिवादी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज, भुगतान रसीदें और शिकायतें प्रमाणिक हैं
  • विपक्षी द्वारा कोई ठोस खंडन नहीं किया गया
  • यह स्पष्ट रूप से “सेवा में कमी” (Deficiency in Service) का मामला है

आदेश (Final Order):

आयोग ने एमडीडीए को निर्देश दिए कि वह:

  1. 45 दिनों के भीतर परिवादी को
    • फ्लैट की खामियों को ठीक कराने में हुए खर्च के रूप में ₹70,440 का भुगतान करे
  2. मानसिक कष्ट एवं असुविधा के लिए
    • ₹10,000 मुआवजा दे
  3. वाद व्यय (Litigation Cost) के रूप में
    • ₹5,000 अतिरिक्त अदा करे
  4. निर्धारित समय में भुगतान न करने पर
    • संपूर्ण राशि पर नियमानुसार ब्याज भी देय होगा

फैसले का महत्व: यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी एजेंसियां भी यदि अपनी जिम्मेदारियों में लापरवाही बरतती हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा।


निष्कर्ष: यह फैसला उन हजारों उपभोक्ताओं के लिए राहत और प्रेरणा है, जो बिल्डर्स या सरकारी एजेंसियों की लापरवाही का सामना कर रहे हैं। उपभोक्ता आयोग ने एक बार फिर साबित किया है कि न्याय पाने के लिए कानूनी रास्ता प्रभावी और मजबूत है।

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