नगर निगम में हुए सफाईकर्मीयों का भौतिक सत्यापन में यह खुलासा हुआ!

दून में हुए सफाईकर्मी वेतन घोटाले ने पूरे शहर में फिर सनसनी फैला दी

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उत्तराखंड: 18 सितंबर. 2025, ब्रहस्पतिवार को देहरादून / राजधानी स्थित  प्राप्त जानकारी के मुताबिक  देहरादून नगर निगम में हुए सफाईकर्मी वेतन घोटाले ने पूरे शहर में फिर सनसनी फैला दी है। जांच में सामने आया है कि सौ वार्डों में से इकत्तीस वार्डों में कुल निन्यानवे फर्जी सफाई कर्मचारियों के नाम पर करोड़ों रुपये का वेतन निकाल लिया गया। यह खेल कोई छोटा मोटा नहीं था बल्कि कई सालों तक चलता रहा। वर्ष 2019 से 2023 के बीच लगातार हर महीने कर्मचारियों की सूची निगम को भेजी जाती रही और समिति के हस्ताक्षर के आधार पर एकमुश्त राशि स्वच्छता समितियों के खातों में डाल दी जाती थी। कर्मचारियों को सीधे डीबीटी से वेतन भेजने का जो नियम था उसे ताक पर रख दिया गया।

जानकारी के मुताबिक शहर कोतवाली में तीन माह पूर्व उप नगर आयुक्त विधि गौरव भसीन की ओर से दी गई तहरीर पर एफआईआर दर्ज हुई। भौतिक सत्यापन में यह खुलासा हुआ कि निन्यानवे कर्मचारी मौके पर नहीं पाए गए जबकि उनके नाम पर नियमित वेतन भुगतान होता रहा। इस घोटाले की भनक करीब डेढ़ साल पहले लगी थी लेकिन एफआईआर दर्ज होने और जांच की गाड़ी आगे बढ़ने में काफी समय लग गया। पुलिस की पूछताछ अब समितियों के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष पर केंद्रित है जिनके हस्ताक्षरों से करोड़ों रुपये ट्रांसफर हुए।

वही जिसमें  आरटीआई से सामने आया कि कर्मचारियों की सूची में कई ऐसे नाम शामिल थे जो समाज के संभ्रांत वर्ग से जुड़े थे और सफाईकर्मी नहीं हो सकते थे। यूनियाल, थपलियाल, सेमवाल, गुप्ता और अग्रवाल जैसे उपनाम सामने आने पर शक गहराया। दरअसल पूरा सिस्टम ही इस तरह तैयार कर दिया गया था कि असली और नकली में फर्क करना लगभग असंभव हो गया। न ही आधार और बैंक खाता की क्रॉस-वेरिफिकेशन हुई और न ही पीएफ व ईएसआई जैसी सुविधाओं का कोई रिकॉर्ड रखा गया।

अब तक की रिपोर्टों के अनुसार नौ करोड़ रुपये का घोटाला पुष्टि के साथ सामने आया है। प्रति फर्जी कर्मचारी औसतन पंद्रह हजार रुपये मासिक वेतन दिखाया गया। अगर निन्यानवे कर्मचारियों को पांच साल तक यह वेतन मिलता रहा हो तो कुल राशि साढ़े आठ से नौ करोड़ रुपये तक बैठती है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह अनुमान भी लगाया गया कि रकम अस्सी करोड़ तक हो सकती है यदि अन्य वार्डों की भी जांच हो। इस समय पुलिस और निगम प्रशासन दोनों पर जवाबदेही है कि वे सही आंकड़े पेश करें।

वही जिसमें  वार्डों की सूची में मालसी, दून विहार, विजय कॉलोनी, श्रीदेव सुमन, वसंत विहार, पंडितवाड़ी, इंद्रा नगर, कांवली, राजीव नगर, लाडपुर, नेहरूग्राम, रायपुर, मोहकमपुर, चक तुनवाला-मियांवाला, लोहिया नगर, माजरा, भारूवाला ग्रांट, बंजारावाला, मोथरोवाला, पित्थूवाला, मेहूंवाला-1, मेहूंवाला-2, आरकेडिया-1, आरकेडिया-2, नत्थनपुर-1, नत्थनपुर-2, नवादा, हर्रावाला, बालावाला, नकरौंदा और नथुवावाला शामिल हैं। इनमें से कई वार्डों में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के पार्षद वर्षों से काबिज रहे हैं, जिससे मामला राजनीतिक रूप से और भी संवेदनशील बन गया है।

साथ ही उच्च न्यायालय में भी इस घोटाले पर सुनवाई शुरू हो चुकी है और राज्य सरकार को जवाब देना पड़ा है। भविष्य में यह घोटाला केवल नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली को ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति को भी हिला सकता है। नगर निगम में वर्षों से चली आ रही समितियों की व्यवस्था, वेतन भुगतान की पारदर्शिता और प्रशासनिक निगरानी की कमी ने मिलकर इस बड़े फर्जीवाड़े को जन्म दिया। अब देखना यह है कि जांच कहां तक जाती है और दोषियों को किस हद तक जवाबदेह ठहराया जाता है।

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